
जिन्दगी अभी बाकी है, प्यारे दोस्तों !अहा ज़िंदगी! लगभग आधी ज़िंदगी निकल गई अपने आप को समझने मे, और यह समझाने मे कि हर दशक, हर साल, हर महीना, हर दिन, हर घंटे और हर कोई अवधि का आधार है–उस का हर पल। और ज़िंदगी हर उस पल के अंदर छुपे उस एहसास को, उस आनंद को, उस अनुभव को, उस अनुभूति को, उस प्रेम को, उस संगीत को, उस रोमांच को, उस उत्साह को, उस नयेपन को–जानने का, जान कर मानने का, और मान कर, जीने का नाम है। आप का क्या मानना है? क्या जान कर मान रहे है या किसी और की बात सुन कर? अभी भी बहुत कुछ बाकी है ज़िंदगी मे – समझ गए कि नहीं?जिन्दगी नहीं मिलेगी दोबारा! जिन्दगी अभी बाकी है प्यारे! ~ गोपीकृष्ण बाली