
जीवन की दीवार में कहानी वह खिड़की है, जिससे बचपन का आंगन स्पष्ट दिखता है ।तकनीकी विकास के चरम सीमा ने लोगों को अकेला कर दिया है। संयुक्त परिवारों के खुले आंगन और कहानी सुनाती दादी /नानी की गोद की जगह टी.वी और मोबाइल ने ले ली है । माता-पिता काम पर जाएं या कहानी सुनाएं ? काम तो काम, फिर उससे उपजा तनाव आज के अभिभावक के जीवन का अभिन्न अंग है। कारण कुछ भी हो नुकसान तो बचपन का ही हुआ है। एक ऐसी पीढ़ी निर्माण के दौर में है, जिसके नैतिक और जीवन मूल्य खतरे में हैं। इसी एक सोच ने 'सुनो कहानी' को जन्म दिया है।